मधुमक्खियाँ और भँवरे पौधों में परागण की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे फूलों से रस (Nectar) लेते समय पराग कणों को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचाते हैं। दुनिया की लगभग एक-तिहाई खाद्य फसलें, जैसे फल, सब्जियाँ, मेवे (nuts) और बीज, परागण के लिए मधुमक्खियों पर निर्भर हैं।
इनके बिना कई जंगली पौधे विलुप्त हो सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाएगा। मधुमक्खियों के कारण फसलों की उपज में 15 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। ये परोक्ष रूप से पौधों की वृद्धि में सहायक होकर प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) और ऑक्सीजन उत्पादन में योगदान देते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।
संक्षेप में, मधुमक्खियाँ और भँवरे प्रकृति के सबसे मेहनती कार्यकर्ता हैं। यदि ये कहीं न जाकर केवल अपने आवास में रहें, तो क्या प्रकृति को कोई लाभ होगा?
ठीक इसी प्रकार मारवाड़ी, यूपी वाले, एमपी वाले और बिहारी जब अपना घर छोड़कर किसी और राज्य में जाकर काम करते हैं, तो वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, जिससे राजकीय कोष में वृद्धि होती है। इसके साथ-साथ स्थानीय लोगों को किराया मिलता है और वे वहाँ अपनी आवश्यकताओं पर धन ख़र्च करते हैं, जिससे स्थानीय लोगों की आय बढ़ती है। वे जो भी कमाते हैं, उसका लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा उसी राज्य की स्थानीय अर्थव्यवस्था में वापस ख़र्च हो जाता है; और वे केवल 10 प्रतिशत ही बचा पाते हैं।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मेरे सामने वाले मकान में एक कमरे का किराया 10,000 रुपये है। उसमें दो सिक्योरिटी गार्ड रहते हैं। एक व्यक्ति के हिस्से में 5,000 रुपये किराया, आने-जाने का ख़र्च कम से कम 1,500 रुपये, खाने का 3,000 रुपये और अन्य विविध ख़र्च 500 रुपये आते हैं। मुझे ये ख़र्चे ज्ञात थे, इसलिए मैंने उनकी सैलरी पूछी (जबकि मुझे उनकी सैलरी पहले से पता थी, क्योंकि उसी एजेंसी के गार्ड वहाँ भी हैं जहाँ मैं काम करता था)।
गार्ड ने बताया कि 12 घंटे की ड्यूटी की सैलरी 10,000 रुपये है। मैंने पूछा, “इतना तो तुम्हारा ख़र्च है, फ़िर घर क्या भेजते हो?” उन्होंने कहा कि वे दूसरी जगह भी एक और शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं, जहाँ से उन्हें 10,000 रुपये और मिल जाते हैं।
मैंने हैरानी से पूछा, “तो भाई, सोते कब हो?”
उनका उत्तर दिल को झकझोर देने वाला था:
“अत्यंत कठिन होता है निज आवास छोड़ प्रवास करना,
तड़प-तड़प कर जीना होता है, कठिन होता है श्वास भरना।”
“जब सोने का दिन आएगा, तब हमेशा के लिए सोना पड़ेगा,
अभी काम न किया, तो परिवार को और मुझे रोना पड़ेगा।”
“उनकी इस कठिन परिस्थिति को मैंने अनुभव किया है और मेरा मानना है कि हमें मिलकर इसे समझना होगा। इस लेखन का सार यही है कि हमें इन प्रवासियों का महत्व समझना चाहिए। इनसे घृणा करना स्वयं की उन्नति और प्रगति को ठुकराने के समान है। ये हमारे देश के ‘श्रम-कुबेर’ हैं, जिनके कठिन परिश्रम से ही देश के ‘धन-कुबेर’ और अर्थव्यवस्था समृद्ध होते हैं। जिस प्रकार मैंने यह विषय आपके सम्मुख रखा है, आप भी इसे अन्य लोगों तक पहुँचाने का प्रयास करें।“
