
अनुक्रमणिका:-
प्रवेश: भूमिका (अज्ञानी से निर्मोही तक का सार)
प्रथम चरण: अज्ञान (भौतिक सुखों का भोग)
अध्याय १: अज्ञान का स्वरूप और उसकी मिठास।
अध्याय २: इन्द्रियों का जाल और क्षणभंगुर सुख।
द्वितीय चरण: ज्ञान (एकांत और अंतर्मुखता का उदय)
अध्याय ३: जब सत्य से सामना होता है।
अध्याय ४: भीड़ में अकेलापन और भीतर की खोज।
तृतीय चरण: वैराग्य (दुखों का रूपांतरण)
अध्याय ५: दुःख से विरक्ति तक की यात्रा।
अध्याय ६: मोक्ष का सूक्ष्म मोह।
चतुर्थ चरण: निर्मोही (समस्त बंधनों से मुक्ति)
अध्याय ७: आत्मा और परमात्मा के पार।
अध्याय ८: सर्वोच्च सोपान: निर्मोही।
भूमिका (Introduction / Preface): अज्ञानी से निर्मोही तक का सार
“अज्ञान में ही भौतिक सुखों का उपभोग होता है। ज्ञान जितना प्रखर होता जाता है, व्यक्ति उतना ही एकाकी और अंतर्मुखी होने लगता है। आरंभ में यह अकेलापन दुःख को जन्म देता है, किंतु धीरे-धीरे यही दुःख ‘वैराग्य’ में परिवर्तित हो जाता है। यद्यपि वैराग्य और मुक्ति की अभिलाषा अर्थात् मोक्ष की अभिलाषा भी एक प्रकार का मोह ही है; अतः इससे ऊपर उठकर ही मनुष्य ‘निर्मोही’ बनता है।
एक निर्मोही सिद्ध पुरुष को न स्वादिष्ट भोजन, सुन्दर वस्त्र और बड़े आवास की लालसा रहती है, न ही देह, आत्मा और परमात्मा का बंधन। उसके लिए स्वर्ग-नरक, पुण्य-पाप, पुनर्जन्म और मोक्ष—किसी की भी सार्थकता नहीं रह जाती। निर्मोही हो जाना ही मनुष्य के लिए चैतन्य का सर्वोच्च सोपान है।”

“निर्मोही हो जाना ही मनुष्य के लिए चैतन्य का सर्वोच्च सोपान है।”
©जय मार्तण्ड ‘मिहिर’o
