
आज के दौर में हम जब भी किसी सुंदर स्थान की यात्रा करते हैं या किसी उत्सव का हिस्सा बनते हैं, तो उन पलों को कैमरे में सहेजने का मोह स्वाभाविक है। मुझे भी यह पसंद है। लेकिन अक्सर मैंने गौर किया है कि जब मेरा पूरा ध्यान लेंस के पीछे होता है, तब मैं उन पलों की जीवंतता को महसूस करने से चूक जाता हूँ।
यहीं एक द्वंद्व जन्म लेता है—कैमरे की छवि या मन की स्मृति?
यक़ीनन, दोनों का अपना महत्व है। एक तस्वीर बीते वक्त का दस्तावेज़ है, तो स्मृति उस वक्त का अहसास। लेकिन मेरी प्राथमिकता अब बदलने लगी है। मैं पहले उन क्षणों में पूरी तरह डूबकर उनका आनंद लेना पसंद करता हूँ। जब मेरा मन उस सुंदरता से तृप्त और प्रफुल्लित हो जाता है, तब मैं कैमरे का रुख़ करता हूँ। क्योंकि मेरा मानना है कि जो पल रूह में न उतर सका, उसे गैलरी में सहेजने का क्या फ़ायदा?
“क्या आपकी गैलरी उन पलों से भरी है जिन्हें आपने जिया ही नहीं? आप किसे चुनेंगे—परफेक्ट शॉट या परफेक्ट अहसास?”
