
जो न समझ सके तुम मन को,
मैं चला जाऊँगा यदि वन को।
मेरे समान कोई साथी न होगा,
कैसे जीओगे अपने जीवन को?
भले तुम्हारे निकट कोई होगा,
किन्तु मुझ-सा न निर्मोही होगा।
भले मेरा तब से संन्यास होगा,
किन्तु उसमें भी विश्वास होगा।
पेड़-पौधे और प्राणी विश्वास करेंगे,
तब केवल वे ही मन में वास करेंगे।
किन्तु मैं रहूँगा न केवल उस वन में,
अपितु रहूँगा तब तुम्हारे भी मन में।
तुम रिक्त रहोगे, मैं विरक्त रहूँगा,
तुम दुर्बल रहोगे, मैं सशक्त रहूँगा।
तब तुम्हें अनुभूति होगी मेरे जाने की,
तब तुम्हें अनुभूति होगी खोने-पाने की।
तब न प्रेम तुमसे ऐसे विशेष होगा,
तब तुम्हारा न कोई अवशेष होगा।
© Jay Maartand ‘Mihir’
