वे पसीने से तरबतरसर से पाँव तलकसुकून उनके साथधूप से छाॅंव तलककई यादें उनके साथशहर से गाॅंव तलक वे मन ही मन सहते हैंहमसे न कुछ कहते हैं ये कैसा रिश्ता-नाता हैये कौन समझ पाता है दायित्वों के बोझ तलेउनकी हर शाम ढले अपने कई सपने रह जाते हैंख़ुद ढॅंग से जी नहीं पाते हैंपिताContinue reading “•पिता•”

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